गंगा-यमुना और घाघरा के कछार से निकली एक आवाज: जब नाव चलाने वाले समाज ने लखनऊ की सत्ता में अपनी हिस्सेदारी तय की नमस्कार साथियों! बिंदास पोल (Bindaas Poll) की क्षेत्रीय दल महा-श्रृंखला में आपका स्वागत है। सुभासपा, रालोद, अपना दल और आज़ाद समाज पार्टी के गहन विश्लेषण के बाद आज हम उस सियासी ताकत का इतिहास टटोल रहे हैं जिसने उत्तर प्रदेश की नदी घाटी बेल्ट में दशकों से उपेक्षित 'मल्लाह, केवट, बिंद, कश्यप और निषाद' समाज को एक अलग झंडे के नीचे संगठित किया— निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल (निषाद पार्टी) । पूर्वांचल में जब भी किसी नदी पुल या घाट के किनारे से गुजरिए, तो एक नारा अक्सर दीवारों पर लिखा दिखता है: "जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी — निषाद राज का मान, आरक्षण ही पहचान।" एक समय इलेक्ट्रो-होम्योपैथी की प्रैक्टिस करने वाले डॉ. संजय कुमार निषाद ने कैसे सिर्फ एक दशक के भीतर सामाजिक आंदोलन खड़ा करके अपने बेटे को गोरखपुर में सीएम योगी के गढ़ से सांसद बनवाया और फिर 2022 में 6 विधायकों के साथ खुद यूपी सरकार में कैबिनेट मंत्री बने? आइए चुनावी आंकड़ों और इति...