सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

सुभासपा का सियासी सफर: 2002 में बसपा से बगावत से लेकर 2022 तक, जानिए कैसे किंगमेकर बने ओम प्रकाश राजभर? Inside Report

sbsp party history om prakash rajbhar political journey purvanchal bindaaspoll strawpoll

पीला गमछा, महाराजा सुहेलदेव का स्वाभिमान और 24 सालों का संघर्ष: कैसे बनी सुभासपा पूर्वांचल की धुरी?

नमस्कार साथियों! बिंदास पोल (Bindaas Poll) की उत्तर प्रदेश क्षेत्रीय दल विशेष श्रृंखला में आपका स्वागत है। यूपी की 45 वीआईपी सीटों और 75 जिलों की पड़ताल के बाद आज से हम शुरू कर रहे हैं सूबे की उन 'किंगमेकर' छोटी पार्टियों की अंदरूनी पड़ताल, जिनके बिना 2027 की सत्ता का समीकरण अधूरा है।

इस कड़ी में सबसे पहला नाम आता है सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) और इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर का।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में राजभर एक ऐसे नेता हैं जिनके बयानों की धार और सियासी दांव-पेचों को विरोधी भी नजरअंदाज नहीं कर पाते। कभी कांशीराम के साथ बसपा में जमीनी राजनीति की शुरुआत करने वाले ओम प्रकाश राजभर ने कैसे एक छोटी सी बिरादरी की आवाज को लखनऊ के गलियारों में सौदेबाजी (Bargaining Power) की सबसे मजबूत ताकत बना दिया? आइए तथ्यों और चुनाव आयोग के आंकड़ों के साथ इस पूरे सफर को समझते हैं।

1. 2002: बसपा से बगावत और पीले झंडे का उदय

ओम प्रकाश राजभर का शुरुआती राजनीतिक जीवन बहुजन समाज पार्टी (BSP) में बीता। वह वाराणसी में बसपा के जिलाध्यक्ष भी रहे और पार्टी के टिकट पर कोलअसला (अब पिंडरा) विधानसभा से 1991 और 1996 में चुनाव लड़े, जहाँ उन्होंने 18,000 से 32,000 तक वोट हासिल किए।

लेकिन 2001-2002 के दौरान मायावती से मतभेदों और टिकट न मिलने के बाद उन्होंने बसपा छोड़ने का फैसला किया।

  • 27 अक्टूबर 2002: बलिया के रसड़ा में उन्होंने सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) की स्थापना की।

  • प्रतीक और पहचान: 11वीं सदी के महान योद्धा महाराजा सुहेलदेव राजभर को पार्टी का आदर्श बनाया गया, पीला झंडा अपनाया गया और 'पीला गमछा' राजभर स्वाभिमान का प्रतीक बन गया।

  • मुख्य एजेंडा: राजभर जाति को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा दिलाना, सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट (कोटा विदिन कोटा) लागू करना और शराबबंदी।

2. 2002 से 2014: 12 सालों का गुमनाम संघर्ष (वोट कटर से पहचान तक)

शुरुआती दौर में सुभासपा को मुख्यधारा की पार्टियां सिर्फ 'वोट कटवा' मानती थीं, लेकिन इन चुनावों में राजभर ने अपना कैडर खड़ा किया:

  • 2004 लोकसभा चुनाव: पार्टी ने 14 उम्मीदवार उतारे और पूर्वांचल में पहली बार 2.75 लाख वोट हासिल किए।

  • 2007 यूपी विधानसभा चुनाव: सुभासपा ने 97 सीटों पर चुनाव लड़ा और कुल 4.91 लाख (0.94%) वोट हासिल कर कई सीटों पर बसपा और सपा के समीकरण बिगाड़े।

  • 2012 यूपी विधानसभा चुनाव: पार्टी ने 52 प्रत्याशी उतारे और लगभग 4.77 लाख (0.63%) वोट बटोरे।

भले ही 2014 तक पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी, लेकिन उसने यह साबित कर दिया कि गाजीपुर, मऊ, बलिया, आजमगढ़ और वाराणसी में उसके पास 15,000 से 30,000 समर्पित वोटों की ताकत है।

3. 2017: भाजपा के साथ पहला बड़ा ब्रेकथ्रू (शानदार स्ट्राइक रेट)

2017 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भाजपा के रणनीतिकारों को समझ आया कि पूर्वांचल में सपा और बसपा को हराने के लिए गैर-यादव ओबीसी को जोड़ना जरूरी है। भाजपा ने सुभासपा के साथ गठबंधन किया।


📊 2017 विधानसभा: सुभासपा का ऐतिहासिक प्रदर्शन

• कुल लड़ी गई सीटें: 8 सीटें
• जीती गई सीटें: 4 सीटें (जहूराबाद, जखनिया, अजगरा और रामकोला)
• स्ट्राइक रेट: 50%
• हासिल वोट: 6,07,911 वोट (0.70% वोट शेयर)

✅ बड़ा परिणाम: ओम प्रकाश राजभर जहूराबाद (गाजीपुर) से खुद विधायक बने और योगी आदित्यनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्री (पिछड़ा वर्ग कल्याण) बनाए गए।

4. 2019 का टकराव और 2022 में अखिलेश के साथ 'लाल-पीला' संगम

सरकार में रहते हुए भी राजभर अपने आक्रामक बयानों और 'कोटा विदिन कोटा' की मांग को लेकर लगातार अपनी ही सरकार को घेरते रहे। 2019 लोकसभा चुनाव से ठीक पहले मतभेद इतने बढ़ गए कि उन्हें कैबिनेट से बर्खास्त कर दिया गया।

इसके बाद 2022 विधानसभा चुनाव में राजभर ने अखिलेश यादव के साथ हाथ मिलाया और इसे 'लाल-पीले' का ऐतिहासिक गठबंधन कहा:

  • 2022 में सीटें और परिणाम: सुभासपा ने सपा गठबंधन में 17 सीटों पर चुनाव लड़ा और 6 सीटों पर शानदार जीत हासिल की (जहूराबाद, जखनिया, बेल्थरा रोड, शिवपुर आदि में कड़ा मुकाबला)।

  • वोट शेयर का रिकॉर्ड: पार्टी को 12,52,925 वोट (1.36% कुल राज्य वोट शेयर) मिले, जो उसका अब तक का सबसे बड़ा प्रदर्शन था।

  • गाजीपुर और आजमगढ़ में भाजपा का सूपड़ा साफ: 2022 में गाजीपुर की सभी 7 और आजमगढ़ की सभी 10 सीटें सपा गठबंधन ने जीतीं, जिसमें राजभर मतों की लामबंदी सबसे बड़ी वजह बनी।

📌 सुभासपा का चुनावी ट्रैक रिकॉर्ड एक नजर में

चुनाव वर्षगठबंधनकुल लड़ी सीटेंजीती गई सीटेंकुल प्राप्त मतमुख्य परिणाम व सियासी प्रभाव
2007 विधानसभाअकेले9704,91,347पूर्वांचल में मजबूत वोट कटर पार्टी के रूप में उभरी।
2012 विधानसभाअकेले5204,77,330कैडर और बूथ स्तर का ढांचा तैयार किया।
2017 विधानसभाभाजपा (NDA)846,07,911पहली बार विधानसभा पहुंची, राजभर कैबिनेट मंत्री बने।
2022 विधानसभासपा (SP+)17612,52,925वोट शेयर दोगुना हुआ, पूर्वांचल में भाजपा को बड़ा झटका दिया।

अगले भाग (Part 2) में क्या होगा?

इस पहले भाग में हमने समझा कि कैसे 20 सालों के भीतर ओम प्रकाश राजभर शून्य से 6 विधायकों वाली ताकत बने।

लेकिन इसके बाद 2023-2024 में ऐसा क्या हुआ कि राजभर फिर से एनडीए में शामिल हुए? घोसी लोकसभा चुनाव में उनके बेटे अरविंद राजभर की हार के पीछे क्या कारण थे? पूर्वांचल की वे 25 सीटें कौन-सी हैं जहाँ राजभर वोट जीत-हार तय करता है, और 2027 में राजभर का अगला कदम क्या होगा?

👉 अगला भाग (Part 2): सुभासपा का कोर वोट बैंक, 2024 घोसी चुनाव का सच, 2027 की 25 विधानसभा सीटें और लाइव Poll — जल्द आ रहा है!

🔗इन्हें भी पढें (Must Read):

📢 जनता की अदालत: आपकी क्या है राय ?

क्या ओम प्रकाश राजभर का बार-बार गठबंधन बदलना एक राजनीतिक मजबूरी है या उनके समाज के हक की रणनीति?

👇 अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें और इस पोस्ट को शेयर करें !


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

🗳️ बस्ती विधानसभा चुनाव 2027: 5 सीटों पर किसका चलेगा दांव? जानिए जनमत पोल !

📌 बस्ती जिले का राजनैतिक मिजाज और जमीनी समीकरण__                      उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र में स्थित बस्ती जिला राजनीति का एक बेहद अहम और संवेदनशील केंद्र है। कुआनो नदी के तट पर बसे इस जिले का चुनावी गणित जितना सीधा दिखता है, धरातल पर उतना ही पेचीदा है। बस्ती जिले में मुख्य रूप से कुर्मी (पटेल), ब्राह्मण, दलित, यादव और मुस्लिम मतदाताओं का भारी बाहुल्य है। यहाँ की राजनीति में पिछड़ों और सवर्णों की राजनैतिक गोलबंदी हमेशा से हार-जीत का मुख्य कारण बनती आई है। अगर पिछले इतिहास पर नज़र डालें, तो 2017 की प्रचंड मोदी लहर में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने यहाँ क्लीन स्वीप करते हुए जिले की सभी 5 सीटों पर परचम लहराया था। लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव में पासा पूरी तरह पलट गया। समाजवादी पार्टी (SP) ने अपने मजबूत गठबंधन और जमीनी मुद्दों के सहारे ज़बरदस्त वापसी की और 5 में से 4 सीटों पर कब्ज़ा जमाकर भाजपा को करारी शिकस्त दी। भाजपा सिर्फ हर्रैया सीट ही बचा सकी थी। 2027 का यह चुनाव भाजपा के लिए खोई हुई ज़मीन वापस पाने की अग्नि...

वाराणसी विधानसभा चुनाव 2027: 8 सीटों का चुनावी इतिहास, प्रमुख मुद्दे और जनमत पोल !

  📌 वाराणसी (काशी) का राजनीतिक इतिहास और महत्व ___ _ उत्तर प्रदेश की राजनीति में वाराणसी (Varanasi Political History) सिर्फ एक जिला नहीं, बल्कि देश की राजनीति का सबसे बड़ा केंद्र बिंदु है। भगवान शिव की नगरी काशी सांस्कृतिक रूप से जितनी समृद्ध है, राजनीतिक रूप से उतनी ही जागरूक भी रही है। वर्तमान में यह क्षेत्र इसलिए सबसे वीआईपी है क्योंकि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहाँ से सांसद हैं।  वाराणसी की धरती ने देश को महान नेता दिए हैं। राजनीतिक दृष्टिकोण से यहाँ व्यापारिक वर्ग, ब्राह्मण, भूमिहार, यादव, मौर्य, पटेल (कुर्मी) और मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा प्रभाव है। यहाँ की जनता का मूड पूरे पूर्वांचल (Eastern UP) की राजनीति की दिशा तय करता है। 🗳️ वाराणसी लोकसभा सीट: एक नज़र में (Varanasi Lok Sabha Equation)______ वाराणसी लोकसभा क्षेत्र (Varanasi Lok Sabha Seat) देश की सबसे चर्चित सीटों में से एक है। सांसद: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (BJP) चुनावी मिजाज: 2014 से लगातार यह सीट भारतीय जनता पार्टी का सबसे मजबूत गढ़ बनी हुई है। पीएम मोदी के यहाँ से चुनाव लड़ने के कारण वाराणसी में विकास...

सोनम वांगचुक, NTA, पेपर लीक और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे पर देश का सबसे बड़ा महा-सर्वे || 10 बड़े सवाल !

नई दिल्ली ग्राउंड रिपोर्ट:  -- दिल्ली का जंतर-मंतर इस समय देश के युवाओं, छात्रों और शिक्षाविदों के सबसे बड़े आंदोलन का केंद्र बन चुका है। सोनम वांगचुक का आमरण अनशन, कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का रात भर का पहरा, NEET धांधली की गूंज और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग—इन सभी मुद्दों ने पूरे देश में एक बड़ी बहस छेड़ दी है। क्या सरकार छात्रों की आवाज़ दबा रही है? क्या NTA को बंद कर देना चाहिए? 2026-2027 के चुनावों में यह युवा वोट बैंक क्या गुल खिलाएगा? बिंदास पोल (Bindaas Poll) आपके लिए इस पूरे राष्ट्रीय मुद्दे से जुड़े 10 सबसे कड़क और बड़े सवाल एक ही पेज पर लेकर आया है। 👇 नीचे दिए गए सभी 10 महा-पोल्स पर अपनी बेबाक वोटिंग करें और अपनी भड़ास निकालें ! 📌 1. सोनम वांगचुक का अनशन और पुलिस कार्रवाई लद्दाख के समाजसेवी सोनम वांगचुक 21 दिन से पेपर लीक के खिलाफ अनशन पर थे, जिन्हें पुलिस ने जबरन अस्पताल पहुंचा दिया। Super Survey Maker 📌 2. शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा छात्रों का सीधा आरोप है कि इतनी परीक्षाओं में धांधली के बाद शिक्षा मंत्री को नैतिक जिम्मेदारी ले...