कोटा से लेकर दिल्ली के मुखर्जी नगर तक, हर गली में कोचिंग मंडी खुली हुई है। एक गरीब या मध्यमवर्गीय बाप अपनी जमीन बेचकर, कर्ज लेकर अपने बेटे-बेटी को डॉक्टर या अफसर बनाने के लिए 5 से 10 लाख रुपये कोचिंग में झोंक देता है। लेकिन जब बच्चा सेंटर पर परीक्षा देने पहुंचता है, तो पता चलता है कि 10-10 लाख रुपये में पर्चे पहले ही बिक चुके हैं।
जो अमीर हैं, वे पैसे देकर पेपर खरीद लेते हैं और जो मेहनत करने वाले गरीब बच्चे हैं, वे ओवरएज होकर डिप्रेशन में चले जाते हैं। क्या यह देश के बच्चों के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात नहीं है?
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